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देश आज मना रहा है परशुराम जयंती, दूसरी ओर कोलारस मै की परशुराम भगवान की पूजा

अक्षय तृतीया के पावन दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। 26 अप्रैल, रविवार को अक्षय तृतीया की तिथि परभगवान परशुराम की जयंती मनाई जाएगी। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान परशुराम श्री हरि विष्णु भगवान के अवतार हैं। इस दिन का बहुत अधिक महत्व होता है। आइए, आज जानते हैं, भगवान परशुराम की आरती और स्तुति...

भगवान परशुराम की पूजा


इस दिन सुबह स्नान करने के बाद मंदिर और पूजा आसन को शुद्ध करने के बाद भगवान परशुराम जी को पुष्प और जल अर्पित करें और उनका आव्हान करें. मान्यता है कि भगवान परशुराम विष्णु के ऐसे अवतार हैं जो हनुमानजी और अश्वत्थामा की तरह सशरीर पृथ्वी पर उपस्थित हैं. भगवान परशुराम को न्याय का देवता भी कहा जाता है.


श्रीराम और श्रीकृष्ण से संबंध


त्रेतायुग में भगवान राम ने जब शिव धनुष को तोड़ा तो परशुराम जी महेंद्र पर्वत पर तपस्या में लीन थे. लेकिन जैसे ही उन्हें धनुष टूटने का पता चला तो क्रोध में आ गए. लेकिन जब उन्हें प्रभु श्रीराम के बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने श्रीराम को प्रणाम किया बाद में श्रीराम ने परशुराम जी को अपना सुदर्शन चक्र भेट किया और बोले द्वापर युग में जब उनका अवतार होगा तब उन्हें इसकी जरूरत होगी. इसके बाद जब भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर में अवतार लिया तब परशुरामजी ने धर्म की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र वापिस कर दिया.


प्राकृतिक सौंदर्य के महत्व को जानते थे


भगवान परशुराम का भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवंत बनाए रखना था. इस कारण वे प्रकृति प्रेमी और सरंक्षक थे. एक वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के लिए जीवंत रहे. उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है. वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे. यहां तक कि कई खूंखार जानवर भी उनके छूने मात्र से उनके मित्र बन जाते थे. उन्होंने बचपन में कई विद्याओं को सीख लिया था.


गणेश जी बनाया था एक दंत


भगवान परशुराम बहुत जल्दी क्रोध आ जाता है. इसी कारण एक बार जब उनका सामना भगवान गणेश जी से हुआ तो उन्होंने रोक दिया इससे वे नाराज़ हो गए. पौराणिक कथा के अनुसार एक बार जब परशुराम जी भगवान शिव के दर्शन करने के लिए कैलाश पर्वत पहुंचे तो भगवान गणेश जी उन्हें शिव से मुलाकात करने के लिए रोक दिया. इस बात से क्रोधित होकर उन्होंने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत तोड़ दिया. इसके बाद से ही भगवान गणेश एकदंत कहलाने लगे.

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